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हाईकोर्ट ने कहां – जज रोबोट नहीं, आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं”

sadikapavitra May 26, 2026
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Allahabad High Court’s stern observation: Judges are facing a daily burden of 400 to 800 cases, yet those who take court orders lightly will not receive relief.

High court Allahabad:- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालती आदेशों की अवहेलना पर बेहद कड़ा और ऐतिहासिक संदेश देते हुए कहा है कि न्यायाधीश कोई “सुपर रोबोट”, “सुपर कंप्यूटर” या “महामानव” नहीं हैं, जो हर मुकदमे पर तुरंत फैसला सुना दें। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि न्यायपालिका पर अत्यधिक कार्यभार होने के बावजूद अदालत के आदेशों की अनदेखी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।

यह महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र ने एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान की, जहां सरकारी अधिकारियों द्वारा चार वर्षों तक हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का पालन नहीं किया गया।

चार साल तक नहीं मिला वेतन, अदालत पहुंचा मामला

पूरा मामला वर्ष 2017 में दाखिल की गई एक रिट याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता राधे श्याम यादव ने नियमित वेतन भुगतान की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

मामले की सुनवाई के बाद 18 अप्रैल 2022 को हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को नियमित वेतन का भुगतान किया जाए।

लेकिन अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद अगले चार वर्षों तक न तो वेतन जारी किया गया और न ही आदेश का पालन किया गया। परेशान होकर याचिकाकर्ता ने अदालत में अवमानना याचिका दाखिल की।

आवेदन लंबित है” कहकर बचने की कोशिश

सुनवाई के दौरान गाजीपुर के जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को निरस्त कराने के लिए “स्टे वेकेशन एप्लीकेशन” दाखिल कर रखी है, जो अभी लंबित है।

सरकारी पक्ष का कहना था कि जब तक उस आवेदन पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक आदेश का पालन नहीं किया जा सकता।

इस दलील पर अदालत ने तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि केवल कोई आवेदन दाखिल कर देने भर से अदालत का आदेश स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। जब तक सक्षम न्यायालय किसी आदेश को स्थगित, संशोधित या रद्द न कर दे, तब तक उसका पालन करना पूरी तरह अनिवार्य होता है।

“हर दिन सैकड़ों मामलों का दबाव झेल रही न्यायपालिका”

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार की वास्तविक स्थिति को भी सामने रखा। अदालत ने कहा—

“प्रत्येक न्यायाधीश के समक्ष प्रतिदिन 400, 500, 600 और कई बार 800 से अधिक मामले सूचीबद्ध होते हैं। न्यायिक प्रक्रिया को पूरा होने में वर्षों और कभी-कभी दशकों का समय लग जाता है। इसके बावजूद समाज यह उम्मीद करता है कि न्यायाधीश लगातार काम करने वाले सुपर रोबोट या सुपर कंप्यूटर की तरह हर मामले में तत्काल निर्णय दे दें।”

कोर्ट ने कहा कि इतना भारी बोझ होने के बावजूद यदि सरकारी अधिकारी अदालत के आदेशों की खुलेआम अवहेलना करने लगें, तो न्याय व्यवस्था पूरी तरह अराजकता में बदल जाएगी।

अदालत बोली — आदेशों की अनदेखी “न्यायपालिका के चेहरे पर थप्पड़”

हाईकोर्ट ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि यदि अधिकारी केवल यह कहकर अदालत के आदेशों की अवमानना करने लगें कि उन्होंने कोई आवेदन दाखिल कर रखा है, तो इससे न्यायपालिका की गरिमा और अस्तित्व दोनों पर खतरा पैदा हो जाएगा।

कोर्ट ने ऐसे रवैये को “न्यायपालिका के चेहरे पर थप्पड़” जैसा बताते हुए कहा कि इस प्रकार की अवहेलना को किसी भी हालत में सहन नहीं किया जा सकता।

चार वर्षों तक नहीं की गई कोई गंभीर कार्रवाई

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार ने चार वर्षों तक अपने “स्टे वेकेशन एप्लीकेशन” को सूचीबद्ध कराने के लिए कोई गंभीर या ठोस प्रयास नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि मामला तभी सक्रिय हुआ, जब 9 अप्रैल 2026 को अदालत ने डीआईओएस को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया। इसके बाद 13 मई 2026 को आवेदन को सूचीबद्ध कराने की मांग की गई।

अदालत ने इसे आदेश पालन से बचने की सुनियोजित कोशिश माना।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला भी नहीं आया काम

सरकारी पक्ष ने अपने बचाव में सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों — विनय कुमार पांडे और अनिल कुमार सिसोदिया — का हवाला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन मामलों की परिस्थितियां पूरी तरह अलग थीं।

कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में या तो अंतरिम आदेश अस्थायी प्रकृति का था या आवेदन की सुनवाई में वास्तविक बाधाएं थीं, जबकि वर्तमान मामले में वर्षों तक कोई प्रभावी पहल ही नहीं की गई।

“बाद में आदेश रद्द हो सकता है” — यह तर्क भी खारिज

हाईकोर्ट ने “रेस्टिट्यूशन के सिद्धांत” का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि भविष्य में अंतरिम आदेश रद्द भी हो जाए, तब भी अदालत के पास पक्षकारों को पूर्व स्थिति में वापस लाने की पर्याप्त शक्ति होती है।

इसलिए केवल इस आशंका के आधार पर कि भविष्य में आदेश बदल सकता है, अदालत के आदेश का पालन टालना पूरी तरह अनुचित और अवैध है।

डीआईओएस को अवमानना का दोषी माना

अंततः अदालत ने जिला विद्यालय निरीक्षक प्रकाश सिंह को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए आदेश दिया कि मामले में आरोप तय किए जाएं।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को 8 जुलाई 2026 को शीर्ष दस मामलों में सूचीबद्ध किया जाए। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोप तय होने से पहले याचिकाकर्ता का लंबित वेतन भुगतान कर दिया जाता है, तो अवमानना कार्यवाही समाप्त की जा सकती है।

हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश :- 

इस फैसले के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है कि अदालत के आदेशों की अनदेखी कर लंबित आवेदनों की आड़ नहीं ली जा सकती।

कोर्ट ने दो टूक कहा कि न्यायाधीश भले ही रोबोट नहीं हैं, लेकिन अदालत के आदेशों का पालन “रोबोटिक सटीकता” और पूरी गंभीरता के साथ किया जाना चाहिए।

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