Comfort system’ prevails in the Industry Department: Video of clerk sleeping on duty goes viral, silence of responsible people raises questions
देर से दफ्तर, काम से किनारा—कुर्सी बनी बिस्तर, जनता के काम ठप; सिस्टम की साख पर उठे बड़े सवाल
संवाददाता
(म.प्र.) कटनी।:- सरकारी दफ्तरों में अनुशासन और समयबद्धता की जो तस्वीर कागजों और दावों में दिखाई जाती है, जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। ताजा मामला जिला मुख्यालय स्थित उद्योग विभाग का है, जहां एक बाबू का ड्यूटी के दौरान आराम फरमाते हुए सामने आया मामला अब चर्चाओं का केंद्र बन गया है।

सूत्रों के अनुसार, विभाग में पदस्थ बाबू दुर्गा प्रसाद सोनी की कार्यशैली लंबे समय से सवालों के घेरे में रही है। बताया जाता है कि वे अक्सर निर्धारित समय से काफी देर बाद—लगभग सुबह 11:30 बजे के बाद—कार्यालय पहुंचते हैं। लेकिन चिंता की बात केवल देर से आने तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यालय में उपस्थित रहने के बावजूद कार्य के प्रति उनकी लापरवाही भी खुलकर सामने आ रही है।
हाल ही में सामने आई तस्वीरों और वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि संबंधित बाबू ड्यूटी समय में ही कुर्सी पर बैठकर गहरी नींद लेते हुए नजर आ रहे हैं। यह दृश्य न केवल विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि उन आम नागरिकों की परेशानी को भी उजागर करता है, जो अपने जरूरी कार्यों के लिए घंटों दफ्तरों के चक्कर काटते हैं।
कार्यालय के अंदरूनी हालात इस ओर भी इशारा करते हैं कि संबंधित कर्मचारी पर वरिष्ठ अधिकारियों का कोई खास नियंत्रण या दबाव नहीं है। यही वजह है कि वे बेखौफ होकर नियमों की अनदेखी करते नजर आ रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि पूरा मामला सामने आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन साधे हुए हैं, जिससे पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यह पूरा घटनाक्रम उस पुरानी कहावत को चरितार्थ करता दिख रहा है—
“जब सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का।”
नियम क्या कहते हैं ?
प्रत्येक शासकीय कर्मचारी के लिए निर्धारित समय पर कार्यालय में उपस्थित रहना अनिवार्य है।
बिना अनुमति देरी से आना स्पष्ट रूप से अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है।
ड्यूटी के दौरान लापरवाही, कार्य में रुचि न लेना या कर्तव्य से विमुख होना कार्रवाई योग्य अपराध माना जाता है।
जनता पर असर📢
इस तरह की लापरवाही का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी लोगों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिससे समय और धन दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, सरकारी तंत्र पर जनता का भरोसा भी कमजोर होता जा रहा है।
बड़ा सवाल❓
क्या जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में कड़ी कार्रवाई करेंगे?
या फिर यूं ही चलता रहेगा यह ‘आराम तंत्र’ और नियम सिर्फ फाइलों तक ही सीमित रह जाएंगे?
अगर समय रहते इस तरह की लापरवाह कार्यशैली पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह केवल एक विभाग की नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर गहरा आघात साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वाकई कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।
