Claims of women’s empowerment are baseless! A female doctor at Mirzapur Women’s Hospital behaves rudely, forcing pregnant patients to wait for two hours.
महिला अस्पताल में महिला ही बनी महिलाओं की पीड़ा की वज़ह
निजी बातचीत में व्यस्त डॉक्टर अंजली ने मरीजों को किया अनदेखा, सवाल पूछने पर कहा—“दिखाना है तो दिखाओ, वरना जाओ”; शिकायत पर स्वास्थ्य अधीक्षक ने भी झाड़ा पल्ला
ब्यूरो रिपोर्ट
Hospital mirzapur मिर्जापुर :- जनपद मिर्जापुर में महिला सशक्तीकरण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के सरकारी दावों की पोल खोलती एक गंभीर घटना सामने आई है। महिला मातृ-शिशु अस्पताल में इलाज के लिए आई महिलाओं के साथ खुलेआम दुर्व्यवहार का मामला उजागर हुआ है, जिससे गर्भवती महिलाओं और उनके परिजनों में भारी आक्रोश है।
निजी वार्तालाप में व्यस्त रहीं डॉक्टर, मरीजों की अनदेखी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, महिला मातृ-शिशु अस्पताल में तैनात डॉक्टर अंजली आपसी व्यक्तिगत बातचीत में व्यस्त थीं। इस दौरान इलाज के लिए आई महिला मरीजों को न सिर्फ नजरअंदाज किया गया, बल्कि उनसे साफ शब्दों में कहा गया कि “दो घंटे लगेंगे, हम व्यस्त हैं।”

सवाल पूछने पर अभद्र जवाब-
जब इंतज़ार से परेशान महिला मरीजों ने डॉक्टर से सवाल किया कि आखिर उनकी समस्या को क्यों अनदेखा किया जा रहा है, तो जवाब और भी चौंकाने वाला था। डॉक्टर अंजली ने कथित तौर पर कहा—
“हम कुछ भी करें, अगर दिखाना है तो दिखाओ, वरना जाओ।”
इसके बाद मरीजों के साथ अभद्र व्यवहार करते हुए उन्हें बाहर जाने के लिए कह दिया गया।
महिला अस्पताल में महिला डॉक्टर की अमानवीय तस्वीर
एक ओर राज्य सरकार महिला सशक्तीकरण और सुरक्षित मातृत्व की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर महिला अस्पताल में ही गर्भवती महिलाओं के सम्मान और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। यह सवाल उठना लाज़मी है कि जिन अस्पतालों को जच्चा-बच्चा की सुरक्षा के लिए संवेदनशील माना जाता है, वहां इस तरह का व्यवहार किस हद तक जायज़ है?
शिकायत पर स्वास्थ्य अधीक्षक का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
मामले को लेकर जब मिर्जापुर के स्वास्थ्य अधीक्षक से संपर्क किया गया, तो उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि “यह हमारे एरिया में नहीं आता” और अभद्र टिप्पणी करते हुए फोन काट दिया। अधिकारियों का यह रवैया स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जनता में उठ रहे तीखे सवाल-
अब सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग द्वारा बजाया जा रहा सुधार और सशक्तीकरण का बिगुल सिर्फ कागज़ों तक सीमित है? क्या गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी लेने वाला तंत्र वास्तव में ज़मीन पर तैयार है?
मिर्जापुर की यह घटना आज आम जनता के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है और लोग दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक महिला सम्मान और सुरक्षित मातृत्व के नारे खोखले ही रहेंगे।
