भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा परसौना बाजार: देवरी सरपंच की गुंडागर्दी और कमीशनखोरी ने कानून को दिखाया ठेंगा!
देवरी/परसौना: लोकतंत्र के जमीनी स्तर पर बैठे जनप्रतिनिधि जब खुद ही ‘भ्रष्टाचारी’ और ‘कमीशनखोर’ बन जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? देवरी ग्राम पंचायत में कुछ ऐसा ही शर्मनाक खेल खेला जा रहा है, जहाँ सरपंच महोदय ने अपनी लालच की भूख मिटाने के लिए सरकारी नियमों और उच्च अधिकारियों के आदेशों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
नीलाम हो गई ईमानदारी, अब सरपंच को चाहिए 5 लाख का ‘जजिया’!
बीते 30 मार्च 2026 को पंचायत इंस्पेक्टर, पीसीओ, सचिव और पंचों की मौजूदगी में परसौना बाजार की नीलामी प्रक्रिया पूरी की गई। भारी गहमागहमी के बीच नरेंद्र कुमार दुबे ने 4 लाख 4 हजार रुपये की उच्चतम बोली लगाकर इस नीलामी को अपने नाम किया। नीलामी के वक्त सरपंच महोदय खुद वहां विराजमान थीं, हर कागज़ पर उनके दस्तखत हुए, लेकिन जैसे ही नीलामी खत्म हुई, सरपंच के अंदर का ‘कमीशनखोर’ जाग उठा।
दलालों के जरिए वसूली का नंगा नाच
हैरानी की बात यह है कि नीलामी के 5 दिन बीत जाने के बाद भी न तो उच्चतम बोली लगाने वाले को अधिकार पत्र दिया गया और न ही राशि जमा कराई गई। विश्वसनीय सूत्रों और पीड़ित पक्ष के अनुसार, सरपंच अब सीधे तौर पर नहीं बल्कि अपने पालतू दलालों के जरिए नरेंद्र दुबे से 5 लाख रुपये की अवैध मांग कर रही हैं। सवाल यह उठता है कि जब बोली 4 लाख 4 हजार की लगी, तो सरपंच को ऊपर से 5 लाख किस बात के चाहिए?
क्या यह ग्राम पंचायत है या कोई वसूली का अड्डा?
जनपद CEO के आदेश को जूते की नोक पर रखती सरपंच!
इस मामले में जनपद सीईओ (CEO) ने स्पष्ट आदेश जारी किया है कि तत्काल नरेंद्र दुबे से मूल राशि जमा कराकर उन्हें अधिकार पत्र सौंपा जाए। लेकिन भ्रष्टाचार में डूबी सरपंच को शायद जिला प्रशासन के आदेशों का कोई डर नहीं है। अपनी जेब भरने के लिए सरपंच महोदय विकास और नियम-कानून के बीच रोड़ा बनकर खड़ी हो गई हैं।
जनता पूछती है सवाल:
जब नीलामी के वक्त सरपंच मौजूद थीं और उनके हस्ताक्षर हुए, तो अब वे अपनी ही बात से क्यों पलट रही हैं?
क्या सरकारी संपत्ति की नीलामी अब सरपंचों के निजी लाभ का जरिया बनेगी?
प्रशासन ऐसे भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों पर नकेल क्यों नहीं कस पा रहा है?
चेतावनी: अगर तत्काल इस मामले में नरेंद्र दुबे को उनका कानूनी हक नहीं दिया गया और कमीशनखोरी के इस खेल को बंद नहीं किया गया, तो यह मामला केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा। जनता के आक्रोश और कानूनी कार्यवाही के लिए सरपंच और उनके दलाल तैयार रहें।
देखना यह है कि प्रशासन इस ‘सरपंच राज’ की मनमानी को कब खत्म करता है!
