रणक्षेत्र बना मोरवा: राजनीति की भेंट चढ़ी खाकी, ‘शौर्य’ के चक्रव्यूह में फिर गिरा एक और सेनापति!
सिंगरौली। मध्य प्रदेश के औद्योगिक हृदयस्थल और सिंगरौली जिले के सबसे संवेदनशील दुर्ग ‘मोरवा थाने’ की धरती पर एक बार फिर प्रशासनिक उथल-पुथल का शंखनाद हुआ है। मोरवा की कमान सँभाल रहे टीआई कपूर त्रिपाठी को पदमुक्त कर सीधे भोपाल मुख्यालय का रास्ता दिखा दिया गया है। यह केवल एक स्थानांतरण नहीं, बल्कि उस दूषित व्यवस्था का प्रमाण है जहाँ ईमानदारी की तलवार, राजनीति के ढाल से टकराकर टूट रही है।
वर्चस्व की जंग और बलि चढ़ती साख
इतिहास गवाह है कि मोरवा की मिट्टी ने कई दबंग अधिकारियों का पसीना देखा है, लेकिन यहाँ की ‘जातीय राजनीति’ और ‘वर्चस्व का जहर’ अच्छे-अच्छों के पैर उखाड़ देता है। यूपी सिंह की विदाई के बाद कपूर त्रिपाठी ने जब इस चुनौतीपूर्ण रणभूमि में कदम रखा था, तब उम्मीद थी कि शांति स्थापित होगी। लेकिन अफसोस! खाकी की साख पर राजनीति का हस्तक्षेप इस कदर हावी हुआ कि व्यवस्था सुधारने की हर कोशिश को चक्रव्यूह में फँसाकर मार दिया गया।
सफेदपोशों की नजर और रसूख का अखाड़ा
मोरवा थाना महज एक थाना नहीं, बल्कि स्थानीय क्षत्रपों और सत्ता के गलियारों में बैठे ‘शतरंज के खिलाड़ियों’ के लिए एक बड़ा अखाड़ा है। यहाँ पुलिसिंग नहीं, बल्कि ‘जी हुजूरी’ की परीक्षा ली जाती है।
- मनीष त्रिपाठी और यूपी सिंह जैसे अधिकारियों की विदाई के बाद कपूर त्रिपाठी का गिरता विकेट यह साफ़ संकेत है कि यहाँ वही टिकेगा जो सिद्धांतों का सौदा करेगा।
- विडंबना देखिए, जिस अधिकारी ने परिस्थितियों को लोहा बनकर थामने की कोशिश की, उसे ही ‘सिस्टम’ ने बेदखल कर दिया।
नए ‘योद्धा’ के लिए चेतावनी भरा सबक
आने वाला नया थाना प्रभारी चाहे जो भी हो, उसके लिए मोरवा की यह कुर्सी ‘काँटों का ताज’ साबित होगी। यह घटनाक्रम चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि यहाँ पद से हटने पर जेब खाली हो न हो, लेकिन ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ और ‘वर्दी के गौरव’ पर जो घाव लगता है, उसकी भरपाई पीढ़ियों तक नहीं होती।
दो टूक: अगर मोरवा में कानून का राज स्थापित करना है, तो पुलिस को अपनी लाठी के पीछे छिपे राजनीतिक दबाव को तोड़ना होगा। वरना, इसी तरह एक के बाद एक ‘सेनापति’ बदलते रहेंगे और माफिया व सफेदपोश अट्टहास करते रहेंगे।
निष्कर्ष: साख की लड़ाई जारी है
कपूर त्रिपाठी का भोपाल जाना उनके व्यक्तिगत करियर का एक पड़ाव हो सकता है, लेकिन सिंगरौली पुलिस की छवि के लिए यह एक गहरा दाग है। क्या अब कोई ऐसा शूरवीर आएगा जो राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदकर मोरवा में कानून का शासन स्थापित करेगा, या फिर अगली बार भी किसी और की प्रतिष्ठा की ‘बलि’ दी जाएगी?
