*फर्जी सर्वे, असली मकान, शिकायतकर्ता के घर पर किसी और ने लिया आवास योजना का लाभ!*
*सीएम हेल्पलाइन भी बेअसर, शिकायत को निराधार बताकर पीसीओ ने किया क्लोज*
*जनपद चितरंगी के ग्राम पंचायत धरौली कला का मामला*
सिंगरौली। शासन की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना को अधिकारीयों ने कमाई का जरिया बना लिया है। ग्राम पंचायत धरौली कला में सामने आया मामला यह साबित करता है कि किस तरह फर्जी सर्वे और अधिकारियों की मिलीभगत से असली हकदारों का हक छीना जा रहा है। शिकायतकर्ता दिलीप मिश्रा का आरोप है कि उन्होंने खुद अपने खर्च से मकान बनाया, लेकिन सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और पीसीओ की कथित सांठगांठ से उनके ही मकान को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम दिखाकर आवास योजना की राशि निकाल ली गई।
आरोप यह भी है कि शिकायतकर्ता के मकान की फोटो का उपयोग कर दूसरे हितग्राही के नाम से दो किस्तों का भुगतान तक कर दिया गया। जब इस पूरे फर्जीवाड़े की जानकारी दिलीप मिश्रा को लगी, तो उन्होंने न्याय की उम्मीद में सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जहां शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए थी, वहीं अधिकारियों ने मामले को ही निराधार बताकर क्लोज कर दिया। जांच रिपोर्ट में यह कहा गया कि शिकायतकर्ता पहले से पक्का मकान होने के कारण अपात्र है और किसी अन्य व्यक्ति को उनके नाम से लाभ नहीं दिया गया है। सवाल यह उठता है कि अगर सब कुछ सही है, तो फिर शिकायतकर्ता के मकान की फोटो और भुगतान की बात सामने कैसे आई? क्या यह जांच केवल कागजों तक सीमित रही। स्थानीय लोगों में इस पूरे मामले को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि सीएम हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था में भी शिकायतों को इस तरह दबाया जाएगा, तो आम आदमी न्याय के लिए आखिर कहां जाएगा। यह मामला न केवल आवास योजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा करता है। अब देखना होगा कि इस कथित गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच होती है या फिर मामला यूं ही दबा दिया जाएगा।
*पीसीओ की रिपोर्ट पर सवाल, शिकायत को बताया निराधार*
सीएम हेल्पलाइन में दर्ज गंभीर शिकायत को जिस तरह पीसीओ ने निराधार बताकर बंद किया, उसने पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हैरानी की बात यह है कि पीसीओ ने शिकायतकर्ता से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा और सीधे क्लोजर रिपोर्ट दे दी। बिना मौके की जांच और बिना पक्ष सुने फैसला कैसे ले लिया गया। क्या यह केवल कागजी खानापूर्ति है या सच को दबाने की कोशिश। ऐसी कार्यशैली न सिर्फ लापरवाही दर्शाती है, बल्कि आम जनता के भरोसे को भी तोड़ने का काम करती है।
