जिम्मेदार बने धृतराष्ट्र, जनस्वास्थ्य से हो रहा खुला खिलवाड़
सिंगरौली। ऊर्जाधानी सिंगरौली, जो आज देश के कई राज्यों को बिजली उपलब्ध करा रहा है, उसी जिले में आम जनता के लिए बनाई गई सुविधाएं अब जनता के लिए ही खतरा बनती जा रही हैं। जिले का सरई रेलवे स्टेशन इसका जीता-जागता उदाहरण बन गया है, जहां यात्रियों की सुविधा के लिए विकसित प्लेटफॉर्म को कोल यार्ड में तब्दील कर दिया गया है।
सरई रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर दो पर बड़े पैमाने पर कोयले का खुलेआम भंडारण किया जा रहा है। रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक और अत्यंत संवेदनशील स्थान पर कोयले का भंडारण न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह यात्रियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
कोयले की धूल से घुट रहा स्टेशन परिसर
स्थानीय लोगों और यात्रियों के अनुसार, कोल यार्ड से उड़ने वाली कोयले की महीन धूल पूरे स्टेशन परिसर में फैल जाती है। प्लेटफॉर्म पर काली धूल की परत जम चुकी है, जिससे यात्रियों को सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन, एलर्जी, दमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए हालात और भी चिंताजनक बने हुए हैं।
सुविधा की जगह संकट बना प्लेटफॉर्म
जहां रेलवे स्टेशन यात्रियों को सुरक्षित, स्वच्छ और सुविधाजनक वातावरण देने के लिए जाने जाते हैं, वहीं सरई स्टेशन पर यात्रियों को प्रदूषण के बीच ट्रेन का इंतजार करना पड़ रहा है। यात्रियों का कहना है कि जिस स्थान पर बैठने, पानी, शौचालय और छांव जैसी मूलभूत सुविधाएं होनी चाहिए थीं, वहां आज कोयले के ढेर नजर आ रहे हैं।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की रहस्यमयी चुप्पी
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर जनस्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे पर जिले के जिम्मेदार अधिकारी, कलेक्टर से लेकर जनप्रतिनिधियों तक, मौन साधे हुए हैं। स्थानीय चर्चाओं में यह बात जोर पकड़ रही है कि यह कोल यार्ड किसी बड़े कॉर्पोरेट समूह से जुड़ा हुआ है, जिसके चलते जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे हैं। चौक-चौराहों पर यह सवाल आम हो चला है कि “क्या जिले के जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि कोल यार्ड संचालकों के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं?”
विकल्प मौजूद, फिर स्टेशन परिसर ही क्यों?
स्थानीय नागरिक दीपेंद्र कुमरा का कहना है कि स्टेशन परिसर के बाहर गैर-आबादी और सुरक्षित क्षेत्र उपलब्ध हैं, जहां कोयले का भंडारण किया जा सकता है। इसके बावजूद जानबूझकर रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक स्थान को चुना गया, जिससे पूरे मामले पर संदेह और गहराता जा रहा है।
आंदोलन की चेतावनी
स्थानीय निवासियों, यात्रियों और सामाजिक संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि रेलवे स्टेशन परिसर में कोल यार्ड किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। मांग की गई है कि प्लेटफॉर्म नंबर दो से तत्काल कोल यार्ड हटाया जाए और इसे आबादी से दूर किसी सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए। यदि शीघ्र ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो क्षेत्रवासी आंदोलन और प्रदर्शन के लिए बाध्य होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और संबंधित विभागों की होगी।
इनका कहना है।
कम्युनिस्ट पार्टी के नेता संजय नामदेव ने कहा कि यह पूरा मामला जिले के जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों के सुस्त व उदासीन रवैये का जीता-जागता उदाहरण है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों को जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है और वे अपने निजी स्वार्थों में ही व्यस्त हैं। इसी वजह से कोल यार्ड संचालक मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं, नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है और उन पर कार्रवाई करने वाला कोई नहीं है।
इनका कहना है।
जिला कांग्रेस कमेटी सिंगरौली (शहर) की पूर्व महामंत्री सुषमा वर्मा ने कहा कि जिस तरह सिंगरौली जिले में इन दिनों नियम-कानूनों को ताक पर रखा जा रहा है, उससे साफ जाहिर होता है कि यहां के जनप्रतिनिधि हों या अधिकारी, सभी अपने निजी स्वार्थों में व्यस्त हैं। जनता की समस्याओं से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नजर नहीं आता।
उन्होंने कहा कि हैरानी की बात यह है कि पत्रकारों द्वारा बार-बार ऐसे गंभीर मुद्दों को उजागर किए जाने के बावजूद न तो जिले के जिम्मेदार अधिकारी और न ही सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधि कोई संज्ञान लेते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शासन-प्रशासन ने जनता की जिंदगी से खिलवाड़ करने के लिए कोल ट्रांसपोर्टरों और कोल यार्ड संचालकों को खुली छूट दे रखी है।
