सिंगरौली। जिले में महिला एवं बाल विकास विभाग इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर नहीं, बल्कि अपनी विफलताओं के कारण सुर्खियों में है। विभाग द्वारा सरकारी फाइलों में योजनाओं की सफलता के जो गुलाबी चित्र उकेरे जा रहे हैं, हकीकत के धरातल पर वे पूरी तरह धुंधले पड़ चुके हैं। आलम यह है कि विभाग अब केवल ‘कागजी घोड़े’ दौड़ाने तक सीमित रह गया है, जबकि जमीनी स्तर पर अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की दीमक इसे खोखला कर रही है।
प्रभार के खेल में उलझी व्यवस्थाएं
विभागीय सूत्रों और स्थानीय जानकारों का स्पष्ट कहना है कि जब से जितेंद्र गुप्ता को जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO) का प्रभार सौंपा गया है, तब से विभाग की रीढ़ पूरी तरह टूट चुकी है। निगरानी तंत्र ठप पड़ा है और जवाबदेही मानो शून्य हो गई है। प्रभार के इस दौर में न तो मैदानी अमले पर कोई नियंत्रण बचा है और न ही योजनाओं के क्रियान्वयन में कोई गंभीरता दिख रही है।
आंगनवाड़ियों के तालों में बंद हुआ बचपन
जिले के आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। हालात यह हैं कि:
अनियमित संचालन: कई केंद्रों के ताले हफ्तों नहीं खुलते, और जहाँ खुलते हैं वहाँ कार्यकर्ताओं की मनमानी चरम पर है।
बुनियादी अभाव: मासूम बच्चों के बैठने की व्यवस्था से लेकर शुद्ध पेयजल तक के लिए केंद्र तरस रहे हैं।
कागजी पोषण: पोषण आहार वितरण में भारी बंदरबांट के आरोप लग रहे हैं। रिकॉर्ड में बच्चों को ‘पुष्ट’ दिखाया जा रहा है, जबकि हकीकत में वे कुपोषण की मार झेल रहे हैं।
योजनाओं का दम घोंटती लालफीताशाही
मातृत्व सहायता और किशोरी सशक्तिकरण जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं सिंगरौली में दम तोड़ती नजर आ रही हैं। पारदर्शिता के अभाव और विभागीय उदासीनता के चलते पात्र हितग्राही दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। भ्रष्टाचार की गूंज ऐसी है कि बिना ‘सुविधा शुल्क’ या ‘सेटिंग’ के योजनाओं का लाभ मिलना दूभर हो गया है।
“अधिकारी केवल समीक्षा बैठकों और कागजी खानापूर्ति में व्यस्त हैं। जनता की शिकायतों को डस्टबिन के हवाले कर दिया जाता है। यह विभाग अब जनसेवा का नहीं, बल्कि अव्यवस्था का केंद्र बन चुका है।” — स्थानीय निवासियों का आक्रोश
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
बड़ा सवाल यह है कि आखिर जिला प्रशासन इस चरमराती व्यवस्था पर मौन क्यों है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को जमीनी हकीकत दिखाई नहीं देती या फिर जानबूझकर इस बदहाली को नजरअंदाज किया जा रहा है? यदि समय रहते इस ‘प्रभार वाली कार्यप्रणाली’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो जिले की हजारों महिलाएं और बच्चे अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित रह जाएंगे।
