“क्या जिला अध्यक्ष भी नतमस्तक हैं? भाजपा में ‘पूनम’ की तानाशाही के आगे सिसक रहा है समर्पण और त्याग!”
“कल कहीं और, आज यहाँ: बिन पेंदे के लोटों को तरजीह, भाजपा में निष्ठावानों की ‘राजनीतिक हत्या’ जारी!”
“सावधान भाजपा! दरी बिछाने वालों की रुलाई ले डूबेगी सत्ता, ‘पावरफुल’ चेहरों के पीछे छिपी है बगावत की चिंगारी!”
सिंगरौली।
अनुशासन और ‘कार्यकर्ता आधारित पार्टी’ का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी के भीतर इन दिनों अंतर्कलह की आंधी चल रही है। जिले के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि पार्टी के वे निष्ठावान कार्यकर्ता, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी, तन-मन और धन लगाकर संगठन को सींचा, आज वे ही हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। स्थिति यह है कि भाजपा कार्यालय अब समर्पित कार्यकर्ताओं के बजाय ‘जी-हजूरी’ करने वालों का अड्डा बनता जा रहा है।
पैराशूट लैंडिंग और निष्ठा का अपमान
पार्टी के भीतर से आ रही खबरें चौंकाने वाली हैं। पुराने और दरी बिछाने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पार्टी में अब ‘पैराशूट कार्यकर्ताओं’ को तरजीह दी जा रही है। ये वे लोग हैं जिनका अपना कोई वैचारिक अस्तित्व नहीं है—जो आज एक दल में हैं, तो कल दूसरे में। विडंबना यह है कि वर्षों तक संघर्ष करने वाले कर्मठ कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर इन नए चेहरों को ‘तवज्जो’ दी जा रही है।
‘पूनम’ के इर्द-गिर्द सिमटी सत्ता: सूत्रों का बड़ा दावा
पार्टी के गलियारों में इन दिनों एक ही नाम की गूँज है— पूनम। सूत्रों और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की मानें तो भाजपा में इन दिनों वही हो रहा है जो पूनम चाहती हैं। उन पर आरोप है कि उनके तानाशाही रवैये के कारण ही पुराने कार्यकर्ताओं को कार्यालय से दूर किया जा रहा है।
पावर सेंटर: चर्चा है कि पूनम इन दिनों इतनी ‘पावरफुल’ हो चुकी हैं कि उनकी बात काटने की हिम्मत जिले के बड़े पदाधिकारियों में भी नहीं है।
अध्यक्ष की लाचारी: दबी जुबान में कार्यकर्ता यहाँ तक कह रहे हैं कि “जिला अध्यक्ष की क्या बिसात, जो पूनम के फैसलों पर उंगली उठा सकें।”
दबे मन से छलक रहा है कार्यकर्ताओं का दर्द
यद्यपि यह भाजपा का अंदरूनी मामला हो सकता है, लेकिन कार्यकर्ताओं की रुलाई अब सड़कों और सोशल मीडिया के बंद कमरों में सुनाई देने लगी है। निष्ठावान कार्यकर्ता बिलख रहे हैं और अपना दर्द साझा करते हुए कहते हैं कि जिस पार्टी के लिए उन्होंने लाठियां खाईं और अपना जीवन समर्पित किया, आज वहां उनकी कोई पूछ-परख नहीं है।
“पार्टी कार्यालय अब सेवा का नहीं, बल्कि ‘सिंडिकेट’ का केंद्र बन गया है। अगर यही हाल रहा तो संगठन की नींव कमजोर होने में वक्त नहीं लगेगा।” — एक गुमनाम निष्ठावान कार्यकर्ता
निष्कर्ष
सत्ता के मद में चूर कुछ लोग शायद यह भूल रहे हैं कि किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसका वह कार्यकर्ता होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी झंडा थामे खड़ा रहता है। यदि ‘पूनम’ जैसे किरदारों के चलते समर्पित कार्यकर्ताओं का मोहभंग होता है, तो आगामी चुनावों में पार्टी को इसका भारी हर्जाना भुगतना पड़ सकता है।
फिलहाल, भाजपा के भीतर सुलग रही यह चिंगारी कब ज्वालामुखी बनेगी, यह वक्त बताएगा।
